Monday, 14 October 2013

टुकड़ा कागज़ का - अवनीश सिंह चौहान

उठता-गिरता
उड़ता जाए
टुकड़ा कागज़ का


कभी पेट की चोटों को
आँखों में भर लाता
कभी अकेले में
भीतर की
टीसों को गाता

अंदर-अंदर
लुटता जाए
टुकड़ा कागज़ का

कभी फ़सादों-बहसों में 
है शब्द-शब्द उलझा
दरके-दरके
शीशे में
चेहरा बाँचा-समझा

सिद्धजनों पर
हँसता जाए
टुकड़ा कागज़ का


कभी कोयले-सा धधका,
फिर राख बना, रोया
माटी में मिल गया
कि जैसे
माटी में सोया

चलता है हल
गुड़ता जाए
टुकड़ा कागज़ का




6 comments:

  1. andar andar lutta jaye tukda kagj ka ,achcha geet hai badhai

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  2. सुन्दर रचना

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  3. बेहद सुंदर रचना।

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  4. शानदार और सार्थक रचना। बहुत बधाई

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  5. सिद्धजनों पर हॅसने और राख होकर माटी में मिल जाने वाला कागज का टुकड़ा कोई हैसियत न रखते हुए भी सम्राटों से बड़ा है। अवनीशजी आप कहॉ-कहॉ से मोती ढॅूढ़ कर लाते हैं? रचना बिल्‍कुल पाठक के मन को छू जाती है।

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नवगीत संग्रह ''टुकड़ा कागज का" को अभिव्यक्ति विश्वम का नवांकुर पुरस्कार 15 नवम्बर 2014 को लखनऊ, उ प्र में प्रदान किया जायेगा। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जा रहा है जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। सुधी पाठकों/विद्वानों का हृदय से आभार।